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शनिवार, 9 अप्रैल 2016

वाणी नहीं, आचरण एवं व्यक्तित्व ही प्रभावशाली उपदेश हैं।

जो आदत छोड़ी न जा सके उसे 'लत' कहते हैं।  एक  लड़के को गुड खाने की  लत लग गयी।परिणामस्वरूप  उसका स्वास्थ्य  दिन प्रतिदिन  ख़राब होने लगा।   पहले तो किसी ने इसपर ध्यान नहीं दिया,  लेकिन जब   हालत इतने    बिगडे  कि   उसका  चलना -फिरना, उठाना-बैठना  मुश्किल  हो गया,  तो  माँ बाप  चिंतित हुए।  उसका  डाक्टरी इलाज आरम्भ किया।डाक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उसकी सेहत में  तनिक भी सुधार नहीं हुआ। डाक्टरों ने सलाह दी कि इसकी गुड खाने वाली आदत  छुडवा दो अन्यथा  इसका जीवन नष्ट हो जाएगा।  परिवार वालों ने  लत छुडवाने के अनेक उपाय किये,  किन्तु सफल  नहीं हुए । लड़के ने गुड खाना बंद नहीं किया । थक-हार कर  उसे  एक महात्मा के पास ले गए। महात्मा को   प्रणाम किया और अपनी समस्या बलाई। महात्मा जी ने उनकी बात  ध्यान से सुनी।  लड़के को  ध्यान से देखा। उसकी पीठ थप-थपाई। कुछ देर मौन रहने के  बाद वे बोले-" इस लड़के को  ले जाओ। एक हप्ते बाद  ले आना। " दुखित दम्पति ने बाबा जी को प्रणाम किया और  उदास मन से लड़के  को साथ लेकर  अपने घर लौट आए । 
एक सप्ताह बाद वे पुनः बाबा जी के पास गए।  उनको  प्रणाम किया।  लड़के के उपचार के लिए विनय-पूर्वक प्रार्थना की। महात्मा जी आसन पर विराजमान हुए और लड़के को अपने सामने बैठाया। उसकी आँखों में झाँकते हुए हुए बहुत ही विश्वास और  शांत स्वर में कहा -"बच्चा ! गुड खाना बंद कर दो ।" इतना कहकर बाबाजी आसन से उठ गये। उनकी आज्ञा पाकर लड़का भी वहाँ से उठ गया और माँ -बाप के साथ  घर चला आया।

लड़के ने गुड खाना छोड़ दिया।  उसकी सेहत में भी सुधार हो गया।  यह देखकर लोग आश्चर्यचकित हुए। जो काम तरह तरह की दवाइओं और  युक्तियों से नहीं हो सका ,वह बाबाजी के दो -शब्दों से कैसे संपन्न हो गया? बाबा जी ने अपनी बात पहली बार जाने पर   क्यों नहीं कही ? इतनी छोटी सी बात के लिए एक हप्ते बाद क्यों बुलाया ? -लोगों के मन में कुतूहल बना रहा। 
जिज्ञासावश लोग बाबजी के पास गए। दंडवत प्रणाम किया। हाथ जोड़कर बाबाजी से कहा -हे महात्मन ! आपकी महान कृपा से लड़के ने गुड खाना छोड़ दिया।  वह अब पूर्णतयः  स्वस्थ   है । महाराज जी ! जो इलाज  दुनिया भर की तमाम कोशिशों के बावजूद संभव नहीं हो सका,  आपके श्रीमुख से निकले दी-शब्दों ने उसे  सहज ही कर दिया। बाबाजी ! हमारे मन में कुतूहल है - आपने  पहली बार आने पर यह बात क्यों नहीं कही ,  एक हप्ते बाद   क्यों बुलाया? "

बाबाजी हँसते हुए  बोले -" प्यारे भक्तो ! पहले मै स्वयं गुड खाने का अभ्यस्त था। उस  बुराई को त्यागने का उपदेश मैं  दृढ़ता से नहीं दे सकता था। फलतः    मेरी दी हुई शिक्षा बेअसर हो  जाती ,  इस लिए मैंने पहले  अपनी आदत सुधारी।  सात दिन में धीरे धीर गुड खाना बंद किया।  तब उस लड़के को गुड न खाने का उपदेश दिया। "

ठीक ही कहा है -वाणी नहीं, आचरण एवं व्यक्तित्व ही प्रभावशाली उपदेश हैं। 



2 टिप्‍पणियां:

वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणां ।
यदोर्वन्शं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।i
यत्र-अवतीर्णो भग्वान् परमात्मा नराकृतिः।
यदोसह्त्रोजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः।।
(श्रीमदभागवद्महापुराण)


अर्थ:

यदु वंश परम पवित्र वंश है. यह मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है. इस वंश में स्वयम भगवान परब्रह्म ने मनुष्य के रूप में अवतार लिया था जिन्हें श्रीकृष्ण कहते है. जो मनुष्य यदुवंश का श्रवण करेगा वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा.