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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

Akrur अक्रूर


यदुकुल की अनेक शाखाए और उप-शाखाये हैं. उनमें  'वृष्णि-वंश' नाम की एक सुप्रसिद्ध और परम पवित्र शाखा भी है जिसे भगवान श्रीकृष्ण का पितृ-कुल माना जाता है. अक्रूर जी का जन्म इसी वंश में हुआ था. वे रिश्ते में श्रीकृष्ण के चाचा लगते थे. 

अक्रूर के  पिता का नाम श्वफल्लक तथा माता का नाम गांदिनी था।  श्वफल्लक जहाँ भी रहते थे वहां ब्याधि, अनावृष्टि आदि का भय नहीं रहता था।  एक बार  काशी के शक्तिशाली राजा  के राज्य में तीन वर्ष तक पानी नहीं बरसा तब उन्होंने श्वफल्लक को बुलाकर अपने यहाँ ठहराया। उनके वहां पधारते ही जल बरसना शुरू हो गया। तदन्तर उसी काशिराज की गांदिनी नामक  पुत्री से उनका विवाह हो गया।  उस दम्पति से तेरह पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई. उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर जी थे. अक्रूर के अतिरिक्त श्वफल्लक के अन्य पुत्रों का नाम - आसंग, सारमेय, मृदुर, म्रिदुविद, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गंधमादन और प्रतिवाहु था तथा पुत्री का नाम सुचीरा था. 

 अक्रूर के देवयान और उपदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।  अक्रूरजी के बारे में कहा जाता है कि वे दान देने वाले, यज्ञ करने वाले, शास्त्रों के ज्ञाता, अतिथियों से प्रेम करने वाले, धैर्यवान, ज्ञानी और धर्मात्मा थे। अपने पिता की भांति वे भी जहाँ जाते थे वहाँ का वातावरण मंगलमय हो जाता था।  चारों तरफ खुशियाँ बिखर जाती थीं .

कंस मथुरा का राजा  था।  वह अत्यंत क्रूर, दुराचारी  और राक्षस प्रवृति का शासक था।   वह श्रीकृष्ण का मामा लगता था.  श्रीकृष्ण की माता,  देवकी उसकी चचेरी बहन थी।  देवकी  उसको बहुत   प्रिय थी।  अपनी इस प्रिय बहन का विवाह बहुत धूम धाम से उसने वसुदेव  जी  के साथ किया। विवाहोपरांत  जब  देवकी और वसुदेव को रथ मे बैठाकर  उनके घर छोडने जा रहा था,  तो रास्ते  मे  आकाशवाणी सुनाई दी , "हे कंस !  जिसे तू इतने धूम-धाम से रथ में बैठाकर उसके घर छोडने जा रहा  है,  उसी  के आठवें पुत्र के हाथों तेरी मृत्यु निश्चित है। "  

 आकाश मार्ग से आयी देववाणी के ये शब्द सुनकर कंस भयभीत हो गया।  वह  देवकी का वध करने पर  उतारू हो गया।    देवकी के बाल पकड कर रथ से नीचे खींच लिया।   म्यान से तलवार   खींच कर  यमदूत की  भाँति उसके सामने खडा हो गया।  देवकी की मृत्युं  निश्चित है- ऐसा विचार कर वसुदेवजी उसके पर्णों की रक्षा का हर सम्भव प्रयास करते रहे। उनके बहुत समझाने-बुझाने और अनुनय -विनय करने  पर भी पापी कंस नही माना।  तब  वसुदेवजी  ने कंस को आश्वासन देते हुये कहा - " महाराज कंस ! देवकी से तो आपको कोई  भय है ही नहीं।  आकाशवाणी के अनुसार  आपकी मृत्यु इसके आठवें पुत्र से होगी। हे राजन!  मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि इसके गर्भ से  उत्पन्न सभी संतान,  पैदा होने के तुरंत बाद,  मै   आपके हवाले कर दिया करूंगा।" वसुदेव के इस  वचन को सुनकर उसने देवकी को छोड दिया,  किंतु उसके   मन से शंका नहीं गई। अपने प्राणों की रक्षा के ख्याल से उसने वसुदेव और देवकी  को बंदी बना लिया। 

 देवकी के जो भी पुत्र पैदा होता  अपने वचन के अनुसार वसुदेव उसे क्रूर कन्स को सौंप देते।  वह बड़ी निर्दयता से उसे मार दिया करता था।  इस प्रकार कन्स ने देवकी के छः पुत्रों को मार डाला।  सातवी बार देवकी के गर्भ मे  भगवान के अन्शावतार शेष जी का आगमन हुआ  । जिन्हे भगवान की आज्ञा के अनुसार योगमाया ने  वसुदेव की रोहिणी नामक  एक अन्य स्त्री  के गर्भ मे स्थापित कर दिया,  जो उस समय गोकुल मे नन्द के घर मे आश्रय  लिए हुए थी।    इस प्रकार देवकी का सातवाँ पुत्र रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुआ। उस  बालक का नाम बलराम था। आठवीं बार परमपिता भगवान श्रीहरि स्वयं देवकी गर्भ मे विराजमान हुए और रोहिणी नक्षत्र  भाद्र पद कृष्ण-पक्ष की अष्टमी अर्धरात्रि में कंस के बंदीगृह में  चन्द्रमा के समान, सोलह कलाओं  से पूर्ण वे  भूलोक में अवतरित हुए।  उसी समय गोकुल मे नन्द के घर योगमाया ने कन्या के रुप मे यशोदा के गर्भ से  जन्म  लिया। भगवान की आज्ञा के अनुसार वसुदेव जी अर्ध रात्रि मे ही बालक को गोकुल लेजाकर अनभिज्ञ  सोई पड़ी यशोदा की गोद में लिटा दिया और कन्या के रूप में उत्पन्न योगमाया को अपने घर लाकर यशोदा को दे दिया। बंदीगृह से नवजात शिशु के रोने की आवाज़ सुनकर जब  पहरेदारों ने कंस को सूचित किया।  वह शीघ्र ही बंदीगृह आ धमका।   कन्या को देवकी  से   छीन लिया और बाहर लाकर एक शिला पर पटक दिया। कन्या कंस के हाथ छूटकर यह कहती हुई आकाश में उड़ गयी -"कि हे  पापी कंस ! तू मुझे क्यों मार रहा है , तुझे मारने वाला तो  जन्म ले चुका है, वह जीवित है। "

मुझे मारने वाला  जीवित है- यह सोचकर कन्स    भयभीत रहने लगा।   एक दिन  देवर्षि नारद ने कंस  के महल मे पाधारे और उसको बताया कि देवकी गर्भ से उत्त्पन्न उसका आठवां पुत्र अभी जीवित है।  उसका नाम कृष्ण है।   वसुदेव ने पैदा होते ही उस बालक को   नन्द के यहाँ पहुंचा दिया था।   वहां से यशोदा की नवजात कन्या को ले आया था।  उस कन्या को देवकी की आठवीं संतान बताकर वध करने के लिए आपको   दिया था।  वध करते समय वह तुम्हारे हाथ से छूटकर यह कहती हुई आकाश में उड़ गई थी कि -"हे पापी कंस! तू मुझे क्यों मारता है तेरा काल तो संसार में अन्यत्र जन्म ले चुका है". यह सब जानकर उसकी आशंका विश्वास में बदल गई और उसके क्रोध का ठिकाना न रहा।  .उसने तत्काल वसुदेव को राजसभा में बुलावाया। क्रोधित कंस वसुदेवजी  की हत्या कर देना चाहता था,,  किन्तु देवर्षि नारद के कहने पर उसने  ऐसा नहीं किया, लेकिन राजसभा में यदुवंशियों के समक्ष उनको बहुत प्रताड़ित और अपमानित किया। 

कृष्ण को मारने की उसकी सभी योजनाएँ विफल हो चुकी थीं।  तब उसने एक नई योजना तैयार की। योजना  'धनुष-यज्ञ; नामक एक उत्सव आयोजित करने की थी ।   कृष्ण और बलराम को उत्सव देखने के बहाने मथुरा बुलाकर मतवाले हाथी के सामने डालकरउनको  मरवा देना चाहता था।   हाथी से बच निकालने पर अखाड़े में चाणूर, मुष्टिक,कूट, शल, तोशाम आदि जैसे खतरनाक पहलवानों के साथ मल्ल करवा कर वध कर देने का निश्चय था।   तब प्रश्न यह था क़ि उनको लिवा लाने के लिए ब्रज कौन जायेगा? 

 अक्रूर जी कंस के यहाँ दान-विभाग के अध्यक्ष थे। वे बहुत ही मिलनसार, प्रभावशाली और कुशल कूटनीतिज्ञ थे।  अन्धक, वृष्णि , भोज आदि सभी यदुवंशियों में सम्मानीय भी थे।   उनके माध्यम से भेजे गए आमंत्रण को कृष्ण, बलराम और नन्द षडयंत्र नहीं समझेंगे और आमंत्रण स्वीकार कर भेंट सामग्री साथ लेकर सहर्ष मथुरा आ जाएंगें।  ऐसा विचार कर उसनेयह कार्य अक्रूरजी को  सौपा। अक्रूरजी भगवान के बड़े भक्त थे। उन्होंने सोचा क़ि यह तो मेरा सौभाग्य है।  इसी बहाने पर-ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हो जायेंगे।  वे रथ में बैठकर भगवान के दर्शन क़ी बात सोचते हुए ब्रज में जा पहुंचे।  उनको वहां आया देख नन्द, यशोदा ,गोप आदि सब आनंदित हो गए।  उनका यथोचित आदर सत्कार किया।   कृष्ण और बलराम ने उनको ह्रदय से लगा लिया। 

अक्रूरजी ने  कंस के सन्देश को  सुनाया औरश्रीकृष्णचंद से एकांत में  बात की।  उनको बताया कि - "कंस यादवों से शत्रुता का भाव रखता है. उसने वसुदेव और देवकी को हथकड़ी से जकडकर कारागार में बंद किया हुआ है. आप दोनों भाइयों को उत्सव में शामिल होने के बहाने मथुरा बुलाकर वध कर देना चाहता है". भगवान श्रीकृष्ण यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने दुष्टों को मारकर पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए ही मानव रूप में अवतार लिया था. कंस जैसे पापी और दुराचारी को मारने का इससे अच्छा अवसर फिर नहीं मिलेगा, यह सोचकर भगवान श्रीकृष्णचंद और रोहिणीनंदन बलभद्र अक्रूर के साथ उत्सव में शामिल होने के लिए मथुरा जाने के लिए तैयार हो गए. .नन्दबाबा सहित अनेक गोपगण भी उनके साथ चल पड़े. श्री अक्रूर जी बहुत ज्ञानी और दिव्य शक्ति के रखवाले थे. लेकिन भगवान को मथुरा ले जाते समय उनके मन में शंका उठने लगी क़ि क्या श्रीकृष्ण कंस वध कर पाएंगे ? एसा न हो कि कंस अपनी योजना के अनुसार राम-कृष्ण का वध करने में सफल हो जाय. इसी शंका के वशीभूत होकर उनके मन के विचार चेहरे पर चिंता के रूप में दिखाई देने लगे. अन्तर्यामी भगवान उनके ह्रदय के भाव को समझ गए. अक्रूरजी स्नान करना चाहते थे. अतएव उन्होंने कुछ दूर जाने के बाद यमुना के किनारे रथ को रोक दिया और यमुना में स्नान करने के लिए चले गये. श्रीकृष्ण और श्री बलराम- वहां रथ में ही बैठे रहे. उन्होंने स्नान करते समय जब डुबकी लगाई तो भगवान कृष्ण मुस्कराते हुए जल में बैठे दिखाई दिए. अक्रूरजी सोचने लगे क़ि देवकीनंदन यमुना किनारे रथ में बैठे थे, वे जल के भीतर कैसे आ गये? शायद वे अब रथ में नहीं होंगे. ऐसा सोचकर मस्तक जल से बाहर निकाला तो देखा कि लीलामयी भगवान श्रीकृष्ण भ्राताश्री बलराम के साथ यमुना किनारे यथावत रथ पर बैठे हुए हैं. उन्हें आश्चर्य हुआ कि एक ही समय में वे जल के अन्दर और बाहर दोनों जगह कैसे विद्यमान हो सकते हैं? मैं कोई सपना तो नहीं देख रहा हूँ. यह सोचकर पुनः जल में डुबकी लगाई तो प्रभुजी को फिर जल में बैठे हुए देखा. मस्तक को फिर ऊपर किया तो भगवान बाहर रथ पर बैठे दिखे. इस प्रकार बार-बार भगवान को एक साथ दो जगह विद्यमान देख कर उनके मन की शंका दूर हो गई . वह समझ गए क़ि ये दोनों भाई साधारण मानव नहीं हैं, बल्कि मानव रूप में नारायण के अवतार है कंस उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. स्नानादि अवश्यक कार्य समाप्त करके गांदिनीनंदन ने पुनः रथ हांक दिया.और दिन ढलते ढलते वे मथुरापुरी जा पहुंचे. इस बीच गोप-गणों के साथ नन्दबाबा भी वहां पहुंच चुके थे. उन्होंने मथुरा नगर के बाहर एक बगीचे में डेरा डाल दिया. भगवान श्रीकृष्ण और बलराम उसी पड़ाव में नंदबाबा के पास रुक गए और अक्रूर को रथ लेकर अपने घर जाने को कह दिया.

श्रीकृष्ण और बलराम ने मथुरा पहुंचकर नगर में कंस द्वारा उनको मारने के लिए तैनात मतवाले हाथी को तथा चाणूर, मुष्टिक,आदि पहलवानों को मार गिराया. फिर पापी कंस और उसके आठ भाइयों का वध किया. तदोपरांत अपने माता-पिता को बंधन से छुड़ा कर उनके चरणों में मस्तक रखकर उनकी वन्दना की. उसके बाद दोनों भाई अपने नाना उग्रसेन के पास गये और उनको कारागार से मुक्त करके यदुवंशियों का राजा बनाया. यज्ञोपवीत हो जाने के बाद उन्होंने गुरु संदीपन के पास जाकर विद्या अध्यन किया और गुरु दक्षिणा स्वरुप उनके मृतक पुत्र को जीवित किया . भगवान श्रीकृष्ण कुछ दिन बाद उद्धवजी और बलरामजी को साथ लेकर, कुछ अपने हितार्थ तथा कुछ अक्रूर जी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उनके घर गए. अक्रूरजी उनको वहां आया देखकर बहुत आनंदित हुए तथा भगवान कृष्ण, बलराम और उद्धवजी का बहुत सत्कार किया. कुशल क्षेम आदि पूछ लेने के बाद श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी से कहा -" हस्तिनापुर में महाराज पाण्डु की मृत्यु हो जाने केबाद धृष्टराष्ट्र वहां की गद्दी पर आसीन हुए है . वह बुआ कुंती और उनके पुत्र पांडवों के साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहे हैं. इसलिए हे चाचा जी! आप पांडवों के हितार्थ, उनका वृतांत जानने के लिए हस्तिनापुर पधारें."
(क्रमशः)

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वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणां ।
यदोर्वन्शं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।i
यत्र-अवतीर्णो भग्वान् परमात्मा नराकृतिः।
यदोसह्त्रोजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः।।
(श्रीमदभागवद्महापुराण)


अर्थ:

यदु वंश परम पवित्र वंश है. यह मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है. इस वंश में स्वयम भगवान परब्रह्म ने मनुष्य के रूप में अवतार लिया था जिन्हें श्रीकृष्ण कहते है. जो मनुष्य यदुवंश का श्रवण करेगा वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा.