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रविवार, 9 अक्तूबर 2011

रुक्मिणी हरण by Ram Avtar Yadav


रुक्मिणी हरण
अत्याचारी कंस मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध का दामाद था. श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर दिया था, इससे क्रोधित होकर जरासंध ने यादवो का पूर्ण रूप से विनाश करने  का प्रण किया  और  तेईस अक्षोहिणी सेना लेकर उसने  मथुरा पर चढ़ाई कर दी। किन्तु  यादवो की सेना ने उसे बुरी तरह पराजित कर दिया।  इस प्रकार उसने सत्रह बार मथुरा पर आक्रमण किया और  हर बार उसे हार का मुंह देखना पड़ा. अपने बलबूते उद्देश्य की पूर्ति  होते न देख उसने कालयमन नामक एक अत्यंत  शक्तिशाली राजा को मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया. कालयमन म्लेक्षों का राजा था और वह संसार में दुर्जेय था. यादवों द्वारा न मारे जाने का शंकर जी का दिया हुआ एक वरदान भी उसे प्राप्त था.  कालयमन ने जब विशाल म्लेक्ष सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया तो भगवान श्रीकृष्ण ने विशवकर्मा को आदेश देकर  रातो -रात सनुद्र के मध्य द्वारिकापुरी नामक एक नगरी का निर्माण करवाया जो विशाल, अभेद्य तथा बहुत ही सुन्दर थी।  योगमाया को आदेश देकर अपने बन्धु - बांधवों को रातों-रात मथुरा से  द्वारकापुरी पहुँचा दिया।  बलराम को मथुरा में ही रहने दिया जिससे वहाँ की शेष प्रजा की रक्षा हो सके।    तदोपरांत श्रीकृष्ण   कोई अस्त्र लिए बिना भ्रमण करते हुए अकेले ही मथुरा के मुख्यद्वार से बाहर निकले. इस तरह बिना हथियार के भगवान को बाहर जाते देखकर   कालयमन  उनको मारने के लिए तीव्रगति से दौड़ पड़ा .  कालयमन को  अपनी ओर आता देखकर लीलामयी भगवान तेजी से भागने लगे. भागते -भागते बहुत दूर निकल गए किन्तु  कालयमन ने पीछा करना नहीं छोड़ा। यह कैसी लीला है कि सबकी रक्षा करने वाले सर्वशक्तिमान  केशव को स्वयं की रक्षा के लिए भागना पड़ रहा है।  कृष्णचंद आगे आगे और कालयवन उनके पीछे-पीछे। भागते भागते पहाड़ों के मध्य उनको एक गुफा दिखाई दी।   मरता क्या न करता,अपने प्राणों की रक्षा के लिए श्रीकेशव झट-पट पहाड़  की उस  गुफा  में जा घुसे।   उस गुफा में मुनि मुचुकुंद जी सोये हुए थे जिन्हें देवताओं से वरदान प्राप्त था कि जाने-अनजाने जो भी उन्हें जगायेगा वह जलकर भस्म हो जाएगा. श्रीकृष्ण तो गुफाके एक कोने में छुपकर बैठ गए। श्रीहरि का पीछा करते हुए कालयवन भी  उसी अँधेरी कन्दरा में जा घुसा. उसने वहां सोये हुए मुनि मुचुकुन्द को श्रीकृष्ण समझ लिया और उन्हें जोर से लात मारी. लात की चोट लगने से मुनिजी जाग गये और उनकी क्रोधित दृष्टि सामने खड़े कालयवन पर पड़ी . उनकी दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया. कालयवन के भस्म हो जाने के पश्चात श्रीकृष्ण मुचुकुन्द के समक्ष आए और उनको परमात्मा प्राप्ति के उपदेश दिए. तत्पश्चात मथुरा वापस आकर बलराम जी को सभी घटनाओं का हाल कह सुनाया. अबतक कालयवन की सेना मथुरा को घेरे खड़ी थी. श्रीकृष्ण बलराम दोनों भाइयों ने मिलकर म्लेक्षों की उस सेना का संहार किया और उनका सारा धन लेकर द्वारिका पुरी पहुंचा दिया. जब श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार म्लेक्ष सेना से आभूषण आदि धन लेकर मनुष्य द्वारकापुरी जा रहे थे उसी समय जरासंध पुनः (अठारवीं बार) तेईस अक्षोहणी सेना लेकर मथुरा पर चढ़ आया. श्रीकृष्ण और बलरामजी के मन में जरासंध का तनिक भी भय न था फिर भी भय होने का नाटक करते हुए वे अनेक योजनों तक कमलदल के समान सुकोमल चरणों से पैदल भागते चले गये. उन दोनों को भागते देख जरासंध हंसने लगा तथा रथों की सेना लेकर उनके पीछे दौड़ा. बहुत दूर तक दौड़ने के कारण दोनों भाई थक कर 'प्रवर्षण' पर्वत पर चढ़ गये. उस पर्वत का "प्रवर्षण" नाम इस लिए था कि वहां सदा ही देवराज इंद्र प्रतिदिन वर्षा करते थे. पर्वत पर चढ़ा जानकर जरासंध ने दोनों भाइयों को वहां बहुत ढूँढा परन्तु उनको कहीं न पाया. इससे व्याकुल होकर उसने पर्वत के चारों ओर ईंधन रखकर आग लगवा दी. आग की भयानक लपटे बहुत तेजी से चारों दिशाओं में फैलती हुई पर्वत की चोटी तक जा दहकी तब श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई ग्यारह योजन (चौवालिस कोस) ऊंचे पर्वत शिखर से उछलकर नीचे पृथ्वी पर कूद पड़े. जरासंध अथवा उसके किसी भी सेवक ने उन दोनों भाइयों को नहीं देखा. दोनों भाई वहां से चलकर द्वारकापुरी में आय बिराजे. जरासंध उनको पर्वत पर भस्म हुआ जानकर अपनी सेना साथ ले मगध देश को वापस चला गया.

इस बीच बलरामजी का विवाह आनर्त देश के राजा रैवत की कन्या रेवती से हो गया था. उधर भगवान श्रीकृष्ण कुण्डिनपुर नगर के भीष्मक नामक नरेश की कन्या रुक्मिणी का हरण करके द्वारिकापुरी ले आए और वहां उससे ब्याह कर लिया. परमसुंदरी रुक्मिणी का हरणकर कैसे किया और किस रीति से द्वारिकापुरी ले आए इसका हाल आगे की पंक्तियों में दिया गया है:-
विदर्भ देश में भीष्मक नामक एक बड़े यशस्वी राजा थे. उनके रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मवाहु, रुक्मेश और रुक्ममाली नामक पाँच पुत्र थे और रुक्मिणी नामक एक पुत्री भी थी. महाराज भीष्मक के घर नारद आदि महात्माजनों का आना - जाना रहता था. महात्माजन प्रायः भगवान श्रीकृष्ण के रूप-रंग, पराक्रम, गुण, सौन्दर्य, लक्ष्मी वैभव आदि की प्रशंसा किया करते थे. उनके मुख से प्रशंसा सुनकर रुक्मिणी जी भगवान श्रीकृष्ण को मन ही मन अपना पति मानने लग गई थी. उधर श्रीकृष्ण भी रुक्मिणी जी को रूपवती, बुद्धिमती, उदार तथा शील -स्वाभाव गुणों से भरपूर समझते हुए सब प्रकार से अपने योग्य मानते थे इसलिए उन्ही से विवाह करना चाहते थे. रुक्मिणी के माता, पिता, भ्राता सभी उसका विवाह श्रीकृष्ण से ही करने की इच्छा रखते थे परन्तु भीष्मक का ज्येष्ठ पुत्र रुक्म श्रीकृष्ण से बड़ा द्वेष रखता था इसलिए उसने अपनी बहन का विवाह श्रीकृष्ण से होने से रोक दिया. उसने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करने का निश्चय किया.

जब रुक्मिणी को इस बात का पता लगा तो वह अत्यंत उदास हो गई. उसने शीघ्र ही एक विश्वासपात्र ब्राहमण को बुलवाया और उसे एक पत्र देकर द्वारिकापुरी श्रीकृष्ण के पास भेज दिया. ब्राहमणदेवता ने द्वारिका पहुँचकर द्वारपालों की आज्ञा लेकर राजभवन में पवेश किया और वहां स्वर्ण सिंहासन पर बिराजमान आदिपुरुष भगवान के दर्शन किए. श्रीकृष्ण ने यथोचित सेवा सत्कार करने के उपरांत उनके आने का कारण पूछा, तब ब्राहमणदेवता ने वहां का सारा वृतांत कह सुनाया और रुक्मिणी जी का भेजा हुआ प्रेमपूर्ण-पत्र पढ़कर सुनाया. पत्र में रुक्मिणी जी ने लिखा था - "हे प्रेम स्वरुप श्यामसुंदर ! हे प्रियतम ! मैंने आपको पति के रूप में वरण किया है. मैंने अपनी आत्मा और मन दोनों आपको अर्पण कर दिया है. हे कमलनाथ ! अब मै आप जैसे वीरवर की पत्नी हूँ, कहीं आपसे पहले शिशुपाल या अन्य कोई पुरुष मुझे स्पर्श न कर सके, आप इसका उपाय कीजिये." तदोपरांत ब्राहमण देवता ने श्रीहरि से कहा - "हे यदुकुलशिरोमणि ! रुक्मिणीजी का यही अत्यंत गोपनीय सन्देश है जिसे लेकर मै आपके पास आया हूँ. इस सम्बन्ध में जो करना हो विचार करके तुरंत ही उसके अनुसार कार्य कीजिये."

केवल दो दिन बाद ही रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से होने वाला था. यह सोचकर श्रीकृष्ण ने उग्रसेन से आज्ञा ले उस ब्राहमणदेवता को अपने साथ बैठाकर तीव्रगति से रथ दौडाते हुए संध्या तक विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर पहुँच गये और वहां राजा भीष्मक की राजबाड़ी में डेरा किया. वहां पहुंचे तो देखते है कि महाराज भीष्मक अपने बड़े पुत्र रुक्म के स्नेहवश अपनी कन्या शिशुपाल को देने के लिए विवाहोत्सव की तयारी करा रहे हैं . जगह जगह ब्याह की सामाग्री रखी है, घर-घर आनंद मंगल हो रहा है, वहां के स्त्री-पुरुष पुष्प, माला, इत्र -फुलेल, गहने, निर्मल-वस्त्र आदि से सजे हुए है. नगर के राजमार्गों , सड़कों, गलियों, चौराहों आदि को खूब सजाया गया है जिससे नगर कि छवि बहुत शोभायमान हो रही है.
अभी तक भगवान श्रीकृष्ण के कुण्डिनपुर आगमन का समाचार राजकुमारी रुक्मिणी को नहीं मिला था इस कारण वह बहुत चिंतित और अधीर हो रही थी. इतने में ब्राहमणदेवता श्रीकृष्ण से आज्ञा लेकर रुक्मिणी के पास पहुँच गए
और श्रीकृष्ण के वहां आगमन की जानकारी दी. भगवान के शुभागमन का समाचार सुनकर रुक्मिणी का ह्रदय आनंद से भर गया.

शिशुपाल की बारात कुण्डिनपुर पहुँच चुकी थी. बारात में शाल्व, जरासंध, दन्तवक्र, विदूरथ, पौन्ड्रक आदि सहस्त्रों नृपति शामिल थे. वे सभी श्रीकृष्ण और बलराम के विरोधी थे. इनको श्रीकृष्ण के वहां आने और रुक्मिणी को हर ले जाने की सूचना भी मिल चुकी थी. इसलिए कृष्ण को रोकने के लिए वे सभी अपनी अपनी सेना को साथ लेकर आए थे. इधर जब बलराम जी को यह सूचना मिली कि रुक्मिणी को लाने के लिए श्रीकृष्ण अकेले ही कुण्डिनपुर गए हैं और वहां विरोधी पक्ष के सारे राजा-लोग उपस्थित है तो वे भी अपनी सेना लेकर तीव्रगति से रथ चलाकर वहां पहुँच गए और श्रीकृष्ण के साथ हो लिए.

जब विवाह होने में एक दिन शेष रह गया था, उस समय राजकुमारी रुक्मिणी तत्कालोचित मंगलाचार से संपन्न हो देवी अम्बिका के दर्शनार्थ चार घोड़ों से जुते हुए रथ पर बैठकर राजमहल से बाहर निकली. बहुत से शूरवीर अस्त्र-शास्त्र लिए उनकी रक्षा में तैनात थे. वे स्वयं मौन थी. अनेकों श्रेष्ट वृद्ध महिलाऐं तथा सखी-सहेलियां सब ओर से उन्हें घेरे हुए थीं. बाजे वाले बाजे बजाते हुए, गवैये गीत गाते हुए और बहुत सी वेश्याएं नाचती हुई साथ चल रही थीं. पुष्प-माला चन्दन आदि अनेक प्रकार की पूजा की सामग्री लिए हुए बहुत सी द्विज-पत्नियां भी साथ चल रही थीं. इस प्रकार मंदिर पहुंचकर कमल के समान सुकोमल हाथ - पैर धोकर आचमन कर वे देवी अम्बिका के पास गईं. द्विज-पत्नियों ने उनसे अम्बिकाजी का पूजन करवाया. तत्पश्चात राजकुमारी रुक्मिणी ने ब्राहमण-पत्नियों और माता अम्बिका को नमस्कार करके प्रसाद ग्रहण किया. उसके बाद मौन तोड़ दिया और एक सहेली का हाथ पकड़ कर वे मंदिर से बाहर निकलीं. उसी समय श्रीकृष्ण सहसा वहां पहुँच गए और राजकुमारी को उठा लिया . उन्हें गरुण चिन्ह वाले अपने रथ पर बैठाकर बलराम आदि यदुवंशियों के साथ वहां से चल पड़े. उस समय जरासंध के वश में रहने वाले अभिमानी राजा इस घटना से प्राप्त हुए अपने पराभव और यश-कीर्ति का नाश सहन नहीं कर सके. पौड्रक, विदूरथ, दन्तवक्र, शाल्व, जरासंध आदि शिशुपाल के पक्षवाले सब के सब राजा क्रोध से आग बबूला हो उठे तथा अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित होकर अपनी-अपनी सेना के साथ महामनस्वी यादवों के समक्ष युद्ध के लिए आ पहुंचे.
शत्रुदल को तीव्र गति से अपनी ओर आता देख यदुवंशियों के सेनापतियों ने भी अपने-अपने अस्त्र संभाल लिए और पीछे की ओर मुडकर अरिदल के सामने आ डटे. जरासंध की सेना के लोग धनुर्वेद के बड़े मर्मज्ञ थे. वे यदुवंशियों पर येसी जोरदार वाणों की वर्षा करने लगे जिससे वहां अन्धकार सा छा गया. उस समय रुक्मिणीजी बहुत भयभीत और विह्वल हो लज्जा सहित श्रीकृष्ण के मुख की ओर देखने लगीं , तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उत्साहित करते हुए कहा - "सुबदने! डरो मत, हमारी सेना प्रबल है शत्रुओं का नाश कर देगी."

बलराम, गद आदि यदुवंशीवीर जब शत्रुओं का पराक्रम और अधिक नहीं सहन कर सके, तब उन्होंने विरोधियों पर वाणों से भीषण प्रहार आरम्भ कर दिया. बलदेव जी के छोटे भाई गद के भीषण वाणों की वर्षा से शत्रु के रथी , घुड़सवार, हाथी-सवार आदि करोड़ों योद्धा अंग विदीर्ण होकर अथवा प्रण -विहीन होकर पृथ्वी पर आ गिरे. अनगिनत घोड़े और सारथि मारे गए. हाथी घायल होकर पृथ्वी पर लोटने लगे. इस प्रकार अपनी सेना का संहार होते देख जरासंध आदि समस्त राजा युद्ध से विमुख होकर भाग गए. अपनी भावी पत्नी का इस तरह अपहरण हो जाने के कारण दुखित शिशुपाल अत्यंत निस्तेज एवं हतोत्साहित हो गया. तब जरासंध आदि राजा उसके पास जाकर बोले - "हे सिंहपुरुष ! इस उदासी को त्याग दीजिये. यह जगत दैव की प्रेरणा से काल के वश में है. इस समय दैव यादवों के अनुकूल है इसलिए हम विशाल-शातिशाली सेना के अधिपति होते हुए भी थोड़ी सी सेना वाले कृष्ण से हार गए. जब दैव हमारे अनुकूल होगा, तब हम द्वारिका जाकर कृष्ण को बाँध लेंगें और प्रिथ्वी को यादव-विहीन कर डालेंगे." इस प्रकार जब उसके मित्रों ने समझाया तब शिशुपाल अनुचरों सहित घर को लौट गया. जीवित बचे हुए राजा भी अपने-अपने नगरो को लौट गये.

रक्मिणी का ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी श्रीकृष्ण से द्वेष रखता था. वह अपनी बहन के इस आसुरी विवाह को सहन नहीं कर सका. उसने वहां उपस्थित सभी राजाओं के मध्य प्रण किया- "मै संग्राम में श्रीकृष्ण को मरकर रुक्मिणी को लौटाए बिना अपनी राजधानी कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूंगा." वह दो अक्षोहिणी सेना लेकर श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ा और बार-बार धनुष टंकार करता हुआ ,कठोर वचन बोलता हुआ श्रीकृष्ण के समक्ष जा पहुंचा. वहां उसने वाणों से ऐसा भीषण प्रहार किया जिससे श्रीहरि घायल हो गये. तब श्रीकृष्ण ने वाणों के द्वारा उसके धनुष के दो टुकड़े कर दिए. फिर उसने श्रीहरि के ऊपर महाशक्ति चलाई . भगवान ने प्रतिप्रहार करके उस शक्ति के भी दो टुकड़े कर दिए. उस खंडित शक्ति ने रुक्मी के सारथि को ही मार डाला. फिर उसने त्रिशूल, गदा, खंग, बरछा आदि जो भी अस्त्र श्रीकृष्ण को मारने के लिए हाथ में लिए प्रभु ने वे सब काट गिराए. अंत में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पैनी धार वाली तलवार हाथ में लेकर रुक्म को मारने को उद्यत हुए. भाई के मारने का उद्योग देखकर भय से विह्वल हुई रुक्मिणी अपने नेत्रों में आंसू भरकर भगवान् के चरणों में गिर अपने भाई के प्राणों भीख मांगने लगी. रुक्मिणी को चरणों में गिरी हुई देखकर दयालु भगवान ने रुक्मी को नहीं मारा. फिर भी रुक्मी उनके अनिष्ट के चेष्टा से विमुख न हुआ. तब भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्म को वस्त्र से बांधकर उसकी दाढ़ी, मूंछ तथा केश कई जगह से मूंडकर उसे कुरूप कर दिया और रथ के पीछे बाँध लिया. इतने में ही बलराम आदि यदुवंशीवीरों ने रुक्म की सेना का विध्वंश करके श्रीकृष्ण के पास आए. वहां रुक्म की दशा देखकर बलरामजी ने दया करके उसको बंधन से छोड़ दिया.

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण तमाम राजाओ को जीतकर विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणीजी को द्वारिका में लाकर विधिपूर्वक उनसे विवाह किया. द्वारिकापुरी में उस समय घर -घर बड़ा ही उत्सव मनाया जाने लगा. भगवती लक्ष्मीजी को रुक्मिणीजी के रूप में साक्षात लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखकर द्वारिकावासी नर-नारियों को परम आनंद हुआ

जय श्रीकृष्ण
!
वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणां ।
यदोर्वन्शं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।i
यत्र-अवतीर्णो भग्वान् परमात्मा नराकृतिः।
यदोसह्त्रोजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः।।
(श्रीमदभागवद्महापुराण)


अर्थ:

यदु वंश परम पवित्र वंश है. यह मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है. इस वंश में स्वयम भगवान परब्रह्म ने मनुष्य के रूप में अवतार लिया था जिन्हें श्रीकृष्ण कहते है. जो मनुष्य यदुवंश का श्रवण करेगा वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा.