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रविवार, 6 नवंबर 2011




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पौन्ड्रक और काशिराज का उद्धार
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काशी के पास करुष नाम का एक छोटा सा राज्य था. वहां के राजा का नाम पौन्ड्रक था.वह बड़ा घमंडी था. काशी-नरेश से उसकी घनिष्ट मित्रता थी. उसके चापलूस सरदार हमेशा उससे कहा करते थे कि आप भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) हैं और जगत की रक्षा के लिए इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं. बार-बार इस प्रकार की झूठी प्रशंसा सुनकर वह मूर्ख सचमुच ही अपने आपको को श्रीकृष्ण समझने लगा. उसने अपने दो हाथों के अतिरिक्त दो नकली हाथ लगा लिया और श्रीकृष्ण के समान ही शंख, चक्र, गदा पद्म, कवच आदि रखने लगा. जब बलराम जी द्वारिका से ब्रज गये हुए थे, उस समय पौन्ड्रक ने कृष्ण के पास दूत भेजकर कहलवाया -" भगवान का अवतार कहे जानेवाला असली कृष्ण मै हूँ, तुम नकली हो. इसलिए तुम स्वयं को वासुदेव (कृष्ण) कहलाना छोड़ दो, अन्यथा मुझसे युद्ध करो." भगवान ने उसके दूत को तिरस्कारपूर्ण सन्देश देकर वापस भेज दिया तथा अकेले ही रथ पर सवार होकर काशी पर चढ़ाई कर दी. पौन्ड्रक उन दिनों अपने मित्र काशिराज के पास ही रहता था. भगवान श्रीकृष्ण के आक्रमण का समाचार पाकर वह दो अक्षौहिणी सेना लेकर मैदान में आ डटा. उसका मित्र काशी-नरेश भी तीन अक्षौहिणी सेना के साथ सहायतार्थ उसके पीछे-पीछे आया. इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वाणों से घमंडी राजा पौन्ड्रक के रथ को तोड़-फोड़ डाला और सुदर्शनचक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया. उसके मित्र काशी के राजा को भी सेना सहित मार दिया तथा वाणों के द्वारा उसके सिर को धड़ से ऊपर लिया और काशी में राजभवन के द्वार पर गिरा दिया. इस प्रकार पौन्ड्रक और उसके मित्र काशिराज को मारकर उनका उद्धार उद्धार कर दिया. तदोपरांत अपनी राजधानी द्वारिका लौट आए.
काशी-नरेश के सुदक्षिण नाम का एक पुत्र था. अपने पिता की इस प्रकार मृत्यु देखकर वह बड़ा क्रोधित हुआ और यादवों से बदला लेने के उद्देश्य से भगवान शंकर की तपस्या करने लगा. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसको दर्शन दिए और कहा - "तुम यज्ञ के देवता की आराधना करो, उससे कृत्या नाम की राक्षसी उत्पन्न होगी. जो ब्राह्मणों का भक्त नहीं होगा कृत्या उसे नष्ट कर देगी." तब उसने आराधना करके जलती हुई अग्नि के समान भयंकर रूपवाली कृत्या को उत्पन्न किया. येसा करते हुए सुदक्षिण यह भूल गया कि श्रीकृष्ण तो स्वयम ब्रह्मण्यदेव है, कृत्या उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती . उसने उस राक्षसरूपी कृत्या को यदुवंशियों के विनाश हेतु द्वारिका भेज दिया. द्वारिकावासी अभिचार की अग्नि को निकट आई देख कर वैसे ही डर गये जैसे जंगल में आग लगने पर हिरण डर जाते हैं. भयाकुल हो वे अपनी रक्षा हेतु भगवान कृष्ण के पास गये. अन्तर्यामी भगवान को समझते हुए तनिक भी देर नहीं लगी कि यह काशी से चली हुई राक्षसी कृत्या है. प्रतिकार स्वरुप उन्होने अपना सुदर्शन चक्र उसके पीछे छोड़ दिया. चक्र के भय से कृत्या उलटी काशी भाग गई. वहां आकर उसने सुदक्षिण और उसके सहयोगी यज्ञकर्ताओं को जलाकर भस्म कर दिया और स्वयम यज्ञकुण्ड में लीन हो गई. उसके पीछे लगा भगवान कृष्ण का चक्र भी काशी आया. चक्र ने पूरे नगर को जलाकर भस्म कर दिया और तत्पश्चात लीलामयी भगवान श्रीकृष्ण के पास द्वारिका लौट आया.

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जय श्रीकृष्ण
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वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणां ।
यदोर्वन्शं नरः श्रुत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।i
यत्र-अवतीर्णो भग्वान् परमात्मा नराकृतिः।
यदोसह्त्रोजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः।।
(श्रीमदभागवद्महापुराण)


अर्थ:

यदु वंश परम पवित्र वंश है. यह मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है. इस वंश में स्वयम भगवान परब्रह्म ने मनुष्य के रूप में अवतार लिया था जिन्हें श्रीकृष्ण कहते है. जो मनुष्य यदुवंश का श्रवण करेगा वह समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा.